हाँ, एक फूल हूँ मैं

हाँ, एक फूल हूँ मैं,
पौधे में निकला कली से मिला,
खुद में एक सम्पूर्ण हूँ मैं,
बेनाम लगे झाड़ की
पहचान मुझसे है,
वीरान पड़े बाग की
आब मुझसे है,
एक बार जो हाथ लगाये मुझे,
मन उसका सुगन्धित कर देता हूँ।


हाँ, एक फूल हूँ मैं,
पौधे में निकला कली से मिला,
खुद में एक सम्पूर्ण हूँ मैं,
लाल, गुलाबी, हरे, नीले
भांति-भांति के रंग मेरे
दुनिया को मैं रंगीन करूँ
यही मेरा काम,
कभी डोली पर बैठ दुल्हन की विदा करूँ,
कभी शहीद के विमान को सजा
उसे अलविदा करूँ।


हाँ, एक फूल हूँ मैं,
पौधे में निकला कली से मिला,
खुद में एक सम्पूर्ण हूँ मैं,
बगिया में काम करते
माली की मेहनत हूँ,
भगवान के चरणों में
बैठाया गया सेवक हूँ,
करता हूँ विनती, मत फेंको
मुझे पैरों के नीचे,
आखिर मैं भी, एक इंसान की मेहनत हूँ।




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3 comments

DS CHOUHAN said...

Nice lines Banna !

ashish sharma said...

बहुत अच्छी कविता....

Ankit said...

Shandar bhai

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