नज़्म- उलझन


हम उनसे उलझे हैं ऐसे, जैसे आपस में उलझी हुई हो लट कई,
ख्वाहिश यूँ है के बन के कंगा, उनकी ज़ुल्फ़ों से गुज़र जाऊं,
खुद को चुभु मगर, उनको सुलझा जाऊं,
गिरती है जब ज़ुल्फें उनके माथे पर आके,
कुछ आँखों में चुभती है, कुछ कानों में घुसती हैं,
कुछ तो लबो से उनके टकराके इतराती हैं बड़ा,
खीज के जब उन ज़ुल्फ़ों को तुम समेटती हो, कमाल लगती हो ।।
                  ✍ प्रियांश वर्मा


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