Collection of Gazal's by Gulzar Sahb

Gulzar Sahb की 6 Most Popular ग़ज़लें (Gazals) 



एक परवाज़ दिखाई दी है
तेरी आवाज़ सुनाई दी है
सिर्फ़ एक सफ़्हा पलट कर उस ने
सारी बातों की सफ़ाई दी है
फिर वहीं लौट के जाना होगा
यार ने कैसी रिहाई दी है
जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
उस ने सदियों की जुदाई दी है
ज़िंदगी पर भी कोई ज़ोर नहीं
दिल ने हर चीज़ पराई दी है
आग में क्या क्या जला है शब भर
कितनी ख़ुश-रंग दिखाई दी है
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दिखाई देते हैं धुँद में जैसे साए कोई
मगर बुलाने से वक़्त लौटे आए कोई
मिरे मोहल्ले का आसमाँ सूना हो गया है
बुलंदियों पे अब के पेचे लड़ाए कोई
वो ज़र्द पत्ते जो पेड़ से टूट कर गिरे थे
कहाँ गए बहते पानियों में बुलाए कोई
ज़ईफ़ बरगद के हाथ में रअशा गया है
जटाएँ आँखों पे गिर रही हैं उठाए कोई

मज़ार पे खोल कर गिरेबाँ दुआएँ माँगें
जो आए अब के तो लौट कर फिर जाए कोई
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दर्द हल्का है साँस भारी है
जिए जाने की रस्म जारी है
आप के ब'अद हर घड़ी हम ने
आप के साथ ही गुज़ारी है
रात को चाँदनी तो ओढ़ा दो
दिन की चादर अभी उतारी है
शाख़ पर कोई क़हक़हा तो खिले
कैसी चुप सी चमन पे तारी है

कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था
आज की दास्ताँ हमारी है
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बीते रिश्ते तलाश करती है
ख़ुशबू ग़ुंचे तलाश करती है
जब गुज़रती है उस गली से सबा
ख़त के पुर्ज़े तलाश करती है
अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार
पीले पत्ते तलाश करती है
एक उम्मीद बार बार कर
अपने टुकड़े तलाश करती है

बूढ़ी पगडंडी शहर तक कर
अपने बेटे तलाश करती है
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 बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद
कोई साज़िश छुपा रहा है चाँद
जाने किस की गली से निकला है
झेंपा झेंपा सा रहा है चाँद
कितना ग़ाज़ा लगाया है मुँह पर
धूल ही धूल उड़ा रहा है चाँद
कैसा बैठा है छुप के पत्तों में
बाग़बाँ को सता रहा है चाँद
सीधा-सादा उफ़ुक़ से निकला था
सर पे अब चढ़ता जा रहा है चाँद

छू के देखा तो गर्म था माथा
धूप में खेलता रहा है चाँद
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 आँखों में जल रहा है बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा सा बरसता नहीं धुआँ
पलकों के ढाँपने से भी रुकता नहीं धुआँ
कितनी उँडेलीं आँखें बुझता नहीं धुआँ
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं
मेहमाँ ये घर में आएँ तो चुभता नहीं धुआँ
चूल्हे नहीं जलाए कि बस्ती ही जल गई
कुछ रोज़ हो गए हैं अब उठता नहीं धुआँ
काली लकीरें खींच रहा है फ़ज़ाओं में
बौरा गया है मुँह से क्यूँ खुलता नहीं धुआँ
आँखों के पोछने से लगा आग का पता
यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

चिंगारी इक अटक सी गई मेरे सीने में
थोड़ा सा के फूँक दो उड़ता नहीं धुआँ



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