तुम मर्द नहीं तुम दर्द हो ( Tum mard nhi tum dard ho)




वो लाख छुपाये बैठी थी
अपने ज़ख्मों को ताले में
क्या तुमने कभी समझा उसे
या लाये कभी उजाले में

वो चीखती रही चिल्लाती रही अपनी इज़्ज़त बचाने को
तुम खड़े वहीं थे भीड़ में , वो भीड़ जो मज़े लेती रही
क्या तुम आगे आये बचाने को

तुम कहते हो तुम मर्द हो
तुम मर्द नहीं तुम दर्द हो
सालों से जमी हुई गर्द हो
गन्दी सी एक फर्द हो
तुम मर्द नहीं तुम दर्द हो

तुमसे बेहतर नामर्द है जो अपना वचन निभाते हैं
ना झूठी मर्दानगी को अपनी शान बताते हैं

मर्द नहीं वो जो रात के अंधियारे में चार दिवारी के भीतर औरत जात पर अत्याचार करे
मर्द है वो जो औरत जाति की इज़्ज़त के ख़ातिर हैवनियोँ से दो हाथ करे।
                                  

 ✍ अनन्य बाजपेई
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3 comments

drmonika sharma said...

बहुत उम्दा

Hindi Writings said...
This comment has been removed by the author.
Team Book Bazooka said...

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