Veer Durgadas Rathore Biography in Hindi || Hindi Writings


Veer Durgadas Rathore (The story of a brave and loyal Rajput)


जन्म:-             13 अगस्त 1638

मृत्यु :-             22 नवंबर 1718 (उज्जैन में)

पिता:-             आसकरण करणोत

माता:-             नेत कंवर

पत्नी:-             प्रेम कंवर

धर्म  :-             हिंदू  (राजपूत)



जीवन परिचय


दुर्गादास सूर्यवंशी कर्णावत राठौड़ राजपूत थे। उनके पिताजी का नाम आस्करण राठौड़ था जोकि मेवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह की सेना के सेनापति थे। वीर दुर्गादास की मां अपने पति और उनकी अन्य पत्नियों के साथ नहीं रही बल्कि वह जोधपुर से दूर एक छोटे से गांव में रही इसी कारण दुर्गादास राठौड़ का लालन पोषण लोनावा नामक गांव में हुआ।


अजीत सिंह को समर्थन


महाराजा जसवंत सिंह का आकस्मिक निधन 1679 में अफगानिस्तान में हो गया। उनके निधन के समय उनके उत्तराधिकारी के रुप में कोई पुत्र नहीं था; लेकिन जसवंत सिंह की दो पत्नियां गर्भवती थी । यह समय औरंगजेब के लिए अनुकूल था । औरंगजेब ने मौके का खूबफायदा उठाया ।उसने राठौड़ कबीले को बहुत परेशान किया। औरंगजेब ने ताहिर खान को जोधपुर किले की संपत्ति पर अधिकार करने भेजा उसने तुरंत ही जाकर जोधपुर पर अपना कब्जा किया ।
19 फरवरी 1679 को जसवंतसिंह की दोनों गर्भवती पत्नियों को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई; किसी कारणवश एक पुत्र (दलथम्भन) तुरंत बाद ही मर गया, परंतु दूसरा पुत्र अजीत सिंह सुरक्षित था।
दुर्गादास राठौड़ समेत कई राजपूत मंत्री अजीत सिंह को उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दिलवाने के लिए औरंगजेब के पास गए, लेकिन औरंगजेब ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।  स्रोतों के अनुसार औरंगजेब चाहता था कि “यदि अजीत सिंह का लालन पोषण मुस्लिम धर्म की मान्यताओं के अनुसार हो तो वह अजीत सिंह को उत्तराधिकारी घोषित कर सकता है!
किसी को भी औरंगजेब का यह रवैया स्वीकार्य नहीं था। उनको संदेह था कि उन पर कभी भी आक्रमण हो सकता है और ऐसा ही हुआ उन पर मुगल सेना ने आक्रमण कर दिया। राजपूतों ने मुगलों को ईट का जवाब पत्थर से दिया।  इस युद्ध में मोकम सिंह बलूंदा उनके पुत्र हरि सिंह बलूंदा घायल हो गए लेकिन उन्होंने मुगलों को दुर्गादास तक नहीं पहुंचने दिया। मोकम सिंह जी की पत्नी बागेल जी ने महाराजा अजीत सिंह जी का बलूंदा में लगभग 1 वर्ष तक लालन पोषण किया बाद में सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें मारवाड़ के दक्षिण किनारे पर स्थित शहर आबू सिरोही के पास अरावली की पहाड़ियों में ले जाया गया। जहां भी अज्ञात के रूप में पले-बढ़े।


अजीत सिंह को कार्यभार सौंपा



अब महाराज अजीतसिंह की आयु अठारह वर्ष की थी। धीरे-धीरे राज्य का काम समझ गये थे, और इस योग्य हो गये थे कि दुर्गादास की सहायता बिना ही राज्य-भार वहन कर सकें। यह देखकर वीर दुर्गादरास ने संवत् 1758 वि. में महाराज अजीत को भार सौंप दिया। जरूरत पड़ने पर अपनी सम्मति दे दिया करता था।जब 1765 वि. में औरंगजेब दक्षिण में मारा गया तो उसका ज्येष्ठ पुत्र मुअज्जम गद्दी पर बैठा और अपने पूर्वज बादशाह अकबर की भांति अपनी प्रजा का पालन करने लगा। हिन्दू-मुसलमान में किसी प्रकार का भेदभाव न रखा। यह देख दुर्गादास ने निश्चिन्त होकर पूर्ण रूप से राज्यभार अजीतसिंह को सौंप दिया, किन्तु स्वतन्त्र होकर अजीतसिंह के स्वभाव में बहुत परिवर्तन होने लगा। फूटी हुई क्यारी के जल के समान स्वच्छन्द हो गया। अपने स्वेच्छाचारी मित्रों के कहने से प्रजा को कभी-कभी न्याय विरुद्ध भारी दण्ड दे देता था।क्रमश: अपने हानि-लाभ पर विचार करने की शक्ति क्षीण होने लगी। जो जैसी सलाह देता था।, करने पर तैयार हो जाता था।स्वयं कुछ न देखता था।, कानों ही से सुनता था।जिसने पहले कान फूंके, उसी की बात सत्य समझता था।धीरे-धीरे प्रजा भी निन्दा करने लगी। दुर्गादास ने कई बार नीति-उपदेश किया, बहुत कुछ समझाया-बुझाया, परन्तु कमल के पत्तो पर जिस प्रकार जल की बूंद ठहर जाती है, और वायु के झकोरे से तुरन्त ही गिर जाती है, उसी प्रकार जो कुछ अजीतसिंह के हृदय-पटल पर उपदेश का असर हुआ, तुरन्त ही स्वार्थी मित्रों ने निकाल फेंका और यहां तक प्रयत्न किया कि दुर्गादास की ओर से महाराज का मनमालिन्य हो गया। धीरे-धीरे अन्याय बढ़ता ही गया। विवश होकर दुर्गादास ने अपने परिवार को उदयपुर भेज दिया और अकेला ही जोधपुर में रहकर अन्याय के परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा।
मनुष्य अपने हाथ से सींचे हुए विष-वृक्ष को भी जब सूखते नहीं देख सकता, तो यह तो वीर दुर्गादास के पूज्य स्वामी श्री महाराज यशवन्तसिंह जी का पुत्र था।, उसका नाश होते वह कब देख सकता था।परन्तु करता क्या? स्वार्थी मित्रों के आगे उसकी दाल न गलती थी, अतएव जोधपुर से बाहर ही चला जाना निश्चित किया। अवसर पाकर एक दिन महाराज से विदा लेने के लिए दरबार जा रहा था।रास्ते में एक वृद्ध मनुष्य मिला, जो दुर्गादास का शुभचिन्तक था।कहने लगा भाई दुर्गादास! अच्छा होता, यदि आप आज राज-दरबार न जाते; क्योंकि आज दरबार जाने में आपकी कुशल नहीं। मुझे जहां तक पता चला है वह यह कि महाराज ने अपने स्वार्थी मित्रों की सलाह से आपके मार डालने की गुप्त रूप से आज्ञा दी है। दुर्गादास ने कहा – ‘ भाई! अब मैं वृद्ध हुआ, मुझे मरना तो है ही फिर क्षत्रिय होकर मृत्यु से क्यों डरूं? राजपूती में कलंक लगाऊं; मौत से डरकर पीछे लौट जाऊं! इस प्रकार कहता हुआ निर्भय सिंह के समान दरबार में पहुंचा और हाथ जोड़कर महाराज से तीर्थयात्र के लिए विदा मांगी। महाराज ने ऊपरी मन से कहा – ‘ चाचाजी! आपका वियोग हमारे लिए बड़ा दुखद होगा; परन्तु अब आप वृद्ध हुए हैं, और प्रश्न तीर्थयात्र का है; इसलिए नहीं भी नहीं की जाती। अच्छा तो जाइए, परन्तु जहां तक सम्भव हो शीघ्र ही लौट आइए। दुर्गादास ने कहा – ‘ महाराज की जैसी आज्ञा और चल दिया; परन्तु द्वार तक जाकर लौटा। महाराज ने पूछा चाचा जी, क्यों? दुर्गादास ने कहा – ‘ महाराज, अब आज न जाऊंगा; मुझे अभी याद आया कि महाराज यशवन्तसिंह जी मुझे एक गुप्त कोश की चाबी दे गये थे, परन्तु अभी तक मैं न तो आपको गुप्त खजाना ही बता सका और न चाबी ही दे सका; इसलिए वह भी आपको सौंप दूं, तब जाऊं? क्योंकि अब मैं बहुत वृद्ध हो गया हूं, न-जाने कब और कहां मर जाऊं? तब तो यह असीम धान-राशि सब मिट्टी में मिल जायेगी। यह सुनकर अजीतसिंह को लोभ ने दबा लिया। संसार में ऐसा कौन है, जिसे लोभ ने न घेरा हो? किसने लोभ देवता की आज्ञा का उल्लंघन किया है? सोचने लगा; यदि मेरे आज्ञानुसार दुर्गादास कहीं मारा गया,तो यह सम्पत्ति अपने हाथ न आ सकेगी। क्या और अवसर न मिलेगा? फिर देखा जायगा। यह विचार कर अपने मित्रों को संकेत किया। इसका आशय समझ कर एक ने आगे बढ़कर नियुक्त पुरुष को वहां से हटा दिया। इस प्रकार धोखे से धान का लालच देकर चतुर दुर्गादास ने अपने प्राणों की रक्षा की। घर आया, हथियार लिये, घोड़े पर सवार हुआ और महाराज को कहला भेजा कि दुर्गादास कुत्तो की मौत मरना नहीं चाहता था।रण-क्षेत्र में जिस वीर की हिम्मत हो आये। अजीतसिंह यह सन्देश सुनकर कांप गया। बोला दुर्गादास जहां जाना चाहे, जाने दो। जो औरंगजेब सरीखे बादशाह से लड़कर अपना देश छीन ले, हम ऐसे वीर पुरुष का सामना नहीं करते।

अंतिम पड़ाव


वीर दुर्गादास इस प्रकार महाराज अजीतसिंह से विरक्त होकर और अपनी उज्ज्वल कीर्ति के फलस्वरूप अनादर और उपेक्षा पाकर उदयपुर चला गया। यहां उस समय राणा जयसिंह अपने पूज्य पिता राणा राजसिंह के बाद गद्दी पर बैठे थे। अजीतसिंह का ऐसा बुरा बर्ताव सुनकर उन्हें बड़ा क्रोध आया। परस्पर का मित्र-भाव छोड़ दिया। वीर दुर्गादास को अपने परिवार के मनुष्यों की भांति मानकर जागीर प्रदान की। थोड़े दिन तक दुर्गादास महाराज के दरबार में रहा, फिर आज्ञा लेकर एकान्तवास के लिए उज्जैन चला गया। वहां महाकलेश्वर का पूजन करता रहा। दुर्गादास का प्राण पंछी अपने पिया से मिलने अनंत यात्रा पर उड़ गया…….. 22 नवंबर 1718 इसको अपनी आयु के प्रत्येक पल का मातृभूमि की सेवा में उपयोग कर वह महान यात्री चल पड़ा। जिसने यशवन्तसिंह के पुत्र की प्राण-रक्षा की और मारवाड़ देश का स्वामी बनाया, आज उसी वीर का मृत शरीर क्षिप्रा नदी की सूखी झाऊ की चिता में भस्म किया गया। एक सामान्य सरदार से संपूर्ण भारतवर्ष को प्रेरित करने वाले यशस्वी राजपूत तक का सफर पूरा कर मनु केसरी में वीर दुर्गादास राठौड़ ने अपनी यात्रा पूर्ण की।
उन महान देशभक्त को सादर नमन……
विधाता! तेरी लीला अद्भुत है।

सोर्स:- Wikipedia


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