Hindi Poem - फ़कीर



Hindi poem hindi story
फ़कीर

अपनी बदनसीबी की राह पर,  
बेचारा आँसूओं के घूट पीकर चलता है,
मटमैले कपड़ो को पहन पर भी वो,
खुद को सबसे खुशनसीब समझता है,
जिन्दगी का सफर तय करने को,
पथरीली राहों पर नंगे पैर वो चलता है,
दो पैसे जुटाने की चाहत में,
तिल तिल करके वो मरता है,
पेट की भूख मिटाने को कूङे में पङे झूठन में वो,
जो अपना हक समझ के उठाता है,
लोग उसे धिक्कारते हैं,
मदद न करने के बहाने से,
न जाने क्या क्या ताने मारते है,
परिवार का शोक उससे देखा नही जाता है,
इसलिए लाचारी का बोझ वो खुशी से उठाता है,
माना वो भी पैसे कमा कर अमीर बन सकता है,
पर गलत काम उससे नही हो सकता है,
पैसे के मोह में,
सो गया है लोगों का मन, 
जो खुद को कहते हैं अमीर,
उसके अंदर अभी भी जिन्दा है उसका जमीर,
शायद इसलिए लोग उसे आज भी कहते हैं फकीर।
                      ✍ अनुभव श्रीवास्तव  "अनुश्री"


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