Story - मोबाइल और इंसान || Hindi writings

   ये घटना सत्य है जिन्हें रोचक तथ्यों के साथ प्रदर्शित किया गया है। अगर किसी के साथ ये घटना घटित हुयी हो तो ये मात्र संयोग नहीं होगा क्योंकि ये बहुत आम बात है और सबके साथ होती ही रहती है।

      कल मुझे एक बड़े मोबाइल सर्विस सेन्टर जाने का दुर्भाग्य प्राप्त हुआ। दुर्भाग्य क्यूं, ये बहुत से लोग खुद जान गये होंगें और जो नहीं जान पाये वो आगे समझ जायेंगें। हाँ तो मैं बता रहा था कि मोबाइल सर्विस सेन्टर गया तो वहाँ पर जाते ही सबसे पहले द्वार पर स्वागत वहाँ के गार्ड महोदय ने किया जो सात आठ लोगो के बीच मे ऐसा घिरा था जैसे हॉस्पिटल का वॉर्ड ब्वॉय तीमारदारों से घिरा होता है जिनके मरीज अंतिम सांस ले रहे हो। जाते ही मुझे भी उन्ही महानुभाव से मिलना पड़ा और उनसे टोकन मिला जिसका नं० इतना ज्यादा था कि एक बार तो चक्कर सा महसूस हुआ पर कर भी क्या सकते थे फिर मैं धैर्य धारण कर एक कोने की सीट पकड़ कर बैठ गया। आसपास का माहौल कुछ गर्म था, सुबह से इंतजार कर रहे लोगो का पारा बढ़ता जा रहा था पर टोकन नं० आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रहा था। और सबके हाव भाव ऐसे थे कि अपने बच्चे को लेकर आये हो डॉक्टर के पास और बहुत ही क्रिटिकल कन्डीशन हो बच्चे की। अपने बच्चे(मोबाइल) को समझाये जा रहे थे कि बेटा अपनी आँखे खुली रखना बस कुछ देर में ही डॉक्टर तुम्हारा चेकअप करेंगें। कुछ थोड़ा धैर्य से इंतजार कर रहे थे क्यूंकि उनका बच्चा डिस्चार्ज होने वाला था मतलब कि सर्विसिंग के बाद मोबाइल की डिलीवरी लेने आये थे। परन्तु कुछ तो इतने उत्सुक थे की रूकना उनके लिये सम्भव नहीं हो रहा था बार बार नजरें उसी यन्त्र पर जा रही थी जो उनके टोकन के नं० को प्रदर्शित करने वाला था। ऐसे ही एक महानुभाव मेरे बगल वाली सीट पर आसीन थे उनका नं० मुझसे पहले था। बात को आगे बढ़ाने से पहले आपको ज़रा इन महाशय का हुलिया बता दूं, कद तो करीब 5 फीट होगा और वज़न 45 किलो से 250 ग्रा० कम ही होगा परन्तु ऊर्जा की कोई कमी ना थी। दो तीन बार तो काउन्टर पर हाथ पटक कर धमकी भी दे आये की काम तेजी से करो अन्यथा अच्छा नहीं होगा।उनका ये प्रयास कार्य में तेजी तो नहीं लाया परन्तु सबके मुख पर इक मुस्कान लाने में जरूर सफल रहा। आने जाने वाले टीका टीप्पणी कर आनंद ले रहे थे और अपना टाइम पास भी हो रहा था। जो अपना मोबाइल देकर निकलता वो तो बिल्कुल खुद को विश्व विजयी ही समझ रहा था। इस हौंच पौंच में स्थिति विकट तो तब हुई जब एक काउन्टर से आवाज़ आयी अरे देखना इंटरनेट काम नहीं कर रहा है स्पीड बहुत धीमी है एकाएक बगल वाले काउन्टर से भी यही वाक्य का उच्चारण  हुआ। सहायक आये पर कुछ कर ना पाये। भीड़ बढ़ रही थी और इंटरनेट अपना दम तोड़ रहा था और लोगों के क्रोध में इजाफा शुरू छोटे छोटे झगड़े शुरू हुये जो क्रान्ति की तरह बढ़ गये। इंचार्ज को मारने का भी प्रयास हुआ पर रोक लिया गया लोगों द्वारा। सब्र तो मुझसे भी नहीं हो रहा था पर कुछ अलग अनुभूति भी थी ये सब देखकर। किसी तरह समय व्यतीत हुआ और मेरी बारी आयी मैंनें भी तत्परता से अपना कार्य करवाना चाहा पर नहीं हुआ। थोड़ा इंतजार करवाने के बाद कंप्यूटर महोदय मान गये और कार्य पूर्ण हुआ। 
          इस अनोखे से अनुभव से मैंनें ये देखा कि आज का व्यक्ति घंटों तक भोजन किये बिना और अपने परिवार से दूर रह सकता है परन्तु कुछ क्षण मोबाइल के बिना नहीं रह सकता। ऐसा आसक्त हो गया है कि उसका कोई काम बिना मोबाइल के नहीं हो सकता। अब मैं ज्ञान दूं कि ये गलत है और मोबाइल का प्रयोग सीमित ही करना चाहिये तो मेरी मूर्खता होगी क्यूंकि आप स्वयं इतने बुद्धिमान है कि जानते है कि क्या करना है और क्या नहीं।
       
~ आयुष पाण्डेय 'सूर्यांश'



निवेदन:- अगर आपको यह "कहानी" अच्छी लगी हो तो इसे शेयर करें और अपने अनुभव हमें Comment करके जरूर बताएं। आपका सुझाव अमूल्य है।


यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे  E-mail करें. हमारी Id है: hindiwritings@gmail.com.पसंद आने पर हम उसे आपके नाम के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!

No comments

लड़कियां महफूज क्यूँ नहीं - शम्भूनाथ | HindiWritings.com

लड़कियां महफूज क्यूँ नहीं - शम्भूनाथ | HindiWritings.com घर घर में जहाँ पूजा हो ||  पूजी जाती हो मुर्तिया ||   उस देश में मु...

Powered by Blogger.