गुम होता बचपन

Gum hota bachpan children day
बचपन की यादें

बच्चे कभी बदलते नहीं , ना ही उनकी सोच।कोई ज़माना , कोई युग बच्चों को बदल ही नहीं सकता।
आज जब मैं अपने बच्चों को देखती हूँ तो वही बचपन तैर कर मेरी आँखों के सामने आ जाता है। वही शरारतें ,वही नादानियाँ,वही खिलखिलाहट,वही अटपटे सवाल; बस कुछ नही दिखता तो वो है बचपन।अजीब लग रहा है ना सुनने में,सब कुछ होते हुए भी बच्चों मे बचपन नहीं है।उम्र भर जो याद करके मुस्कुरा सके ,ऐसे लम्हे नहीं है।
कितना अंतर अा गया है ,हमारे और हमारे बच्चों के बचपन मे।कहाँ हम शाम होते ही बेपरवाही के साथ घर से बाहर निकल जाती थी खेलने और दो घंटे से पहले घर मे कदम नहीं रखते थे।ऐसा कौन सा खेल नहीं जो हमने खेला ना हो- छुपा - छुपी,कब्बडी,खो खो और भी ना जाने क्या क्या।मुस्कुरते हुए और पसीनों,मिट्टी मे भरे हुए घर मे घुसते थे।शारिरिक तौर पर थके हो पर मानसिक रुप तरोताजा होते थे इसलिए पढ़ाई भी अच्छे से कर लेते थे। होमवर्क के नाम पर बस  कुछ विषयों मे प्रश्नोत्तर मिलते थे जो करके हम समय से सो जाते थे और माँ के साथ ही सुबह पाँच बजे उठ जाते थे। सब कुछ बहुत साधारण और चिंतारहित था।
      आज हमारे बच्चे ऊंघते हुए सुबह उठते हैं क्योंकि देर रात तक जागते हैं । इसलिए नहीं कि रात में मोबाइल या टेलीविज़न देखते हैं बल्कि स्कूल का होमवर्क ही इतना ज़्यादा होता है। स्कूल में पढाई तो बस नाममात्र की होती है ज़्यादातर कार्य घर से ही कर के ले जाने होते हैं ।उसके अतिरिक्त प्रोजेक्टस, साप्ताहिक टेस्ट , अन्य एक्टिविटीज़ भी होती है जिससे बच्चों को ना ही खेलने का समय मिलता है ना ही माता-पिता के साथ बिताने का । स्कूल और माता -पिता की महत्वाकांक्षाओं के बीच बच्चे पिस जाते हैं।हर क्षेत्र मे होड़ और तुलना का सामना करते - करते उनका बचपन कहीं खो जाता है।
स्कूल से अाने के बाद एक ही स्थान पर बैठ कर पढ़ने और खाने से बच्चों का शारिरिक और मानसिक विकास भी रुक गया है ।पड़ोस में या गलियों में तो खेलने का रिवाज़ समाप्त ही हो गया है। आजकल कोई किसी का विश्वास नहीं करता। बच्चों  को कुछ ज्यादा ही परवाह से रखा जाता है जिससे वे ज्यादा ही संवेदनशील हो गये है।गर्मियों और सर्दियों की छुट्टियाँ बच्चे बस मोबाइल और टेलिविज़न का प्रयोग कर बिताते हैं।
आधुनिक युग,गैजेट्स और आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने मिलकर बच्चों के बचपन और मासूमियत की हत्या कर दी है।बच्चों मे अधिक अंक प्राप्त करने,फैशन और स्वयं को सबसे बेहतर साबित करने की होड़ सी हो गयी है फलस्वरुप  बच्चे ,बच्चे ना रहकर समय से पूर्व ही बड़े हो गये हैं।
यदि बच्चों के बचपन को जिन्दा रखना है तो उन्हें वास्तिविक शिक्षा और ज्ञान की तरफ प्रेरित करना होगा।उनका खेलों की तरफ रुझान बढ़ाना होगा।उनके मनोभावों को समझने के लिए उन्हें समय और प्यार देना होगा तभी हम उनके बचपन को बचा सकते हैं॥

                                 ✍ निधि


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