कहानी- मजबूर भोला (Majboor Bhola) by Nirvendra Singh | HindiWritings.com


               
Nirvendra Singh Panwar story, majboor bhola, majboor bhola by Nirvendra Singh, majboor bhola on HindiWritings.com, hindi stories HindiWritings.com, दारुण कथा, दारुण कथा हिंदी, निरवेन्द्र द्वारा दारुण कथा
 

 Majboorbhola by Nirvendra Singh, कहानी मजबूर भोला (निरवेन्द्र सिंह), majboor bhola HindiWritings.com, hindi story majboor bhola, hindi stories, दारुण कथा, stories by Nirvendra Singh, story.


कहानी- मजबूर भोला (Majboor Bhola) by Nirvendra Singh


एक 7-8 साल का बच्चा था। मां उसको इस संसार के भरोसे छोड कर चली थी पिताजी पहले ही संसार से विदा हो लिए थे। अब उसकी पूरी जिम्मेदारी काका-काकी पर थी। समाज के कुछ "सभ्य" लोग उन्हें नीच जाति का कहा करते थे। काका के घर में पहले से ही खाने के लाले पड़े थे अब एक और बोझ उस पर आन पड़ा। काका बाला ने इससे पीछा छुड़ाने की सोची; खूब सोचने के बाद उसके दिमाग में शकुंतला आई अपनी कड़क बोली और क्रोधिले स्वभाव के चलते आसपास के गांव के लोग उसे "नाशपीटी" कहकर संबोधित करते थे। लेकिन यह सब उसकी पीठ पीछे होता था।इस बात को शकुंतला भी जानती थी। उनके घर में पांच-छः भैंसे थी। बाला अगली सुबह ही शकुंतला से भोला की बात करने चल पड़ा। बाला को कोतुहल भरी निगाह से देखकर शकुंतला बोली- " कैसे आना हुआ बाला?"
"खम्मा घणी हुजूर; अपना एक बच्चा है उसको काम चाहिए।"
" भैंसों को संभाल लेगा?"
"बेहिचक हुजूर।" बाला ने गर्व से कहा।
"कल से काम पर लगा दे। दूध दुहना आता है?"
"अभी नहीं आता हुजूर; आपके साथ रहेगा तो सीख जाएगा।"
"महीने के 1000 रुपए और खाना-पीना, तंबाकू और रहने को बाड़े वाला कमरा मिल जाएगा।"
 बाला को ₹1000 कम लगे लेकिन वह चाहकर भी कुछ कह नहीं पाया।  उसे उसके घर की आर्थिक स्थिति पता थी और यह 1000 रुपए उसके लिए 10,000 से कम नहीं थे।
"जो आज्ञा अन्नदाता।"

यह भी पढ़ें:- सफल और असफल इंसान में फर्क (स्वामी विवेकानंद)

बाला अपना सा मुंह लिए वापस गांव की राह पकड़ लिया। रास्ते में सोचता जा रहा था कि भोला को क्या-क्या शिक्षा देनी है। अभी उसको अनुभव नहीं है न बड़े लोगों के घर में काम करने का; उन से बात करने का; कहीं वहां तू-तड़ाके से पेश आ गया तो फिर इसकी खेर नहीं। वह शकुंतला का गुस्सा पहले कई बार देख चुका था। यह सब सोचते-सोचते कब उसका गांव आ गया, पता ही नहीं चला। घर पहुंच कर उसने सारा वाकिया मीरा को कह सुनाया और भोला का सामान बांधने को कहा।
 आखिरकार वह दिन आ ही गया जब नीरस, अनजान, बेसुध भोला आज दूसरे गांव में था। यहां कोई उसका परिचित नहीं था। उसे लगता था वह परदेस में आ गया। उसने सपने कुछ और ही देखे थे लेकिन उसके तूफानी जीवन में कुछ और ही हो रहा था।
 अगले दिन शकुंतला के निर्देशानुसार वह सुबह जल्दी ही जाग गया और बेमन से काम पर लग गया। पहला दिन था सो शकुंतला ने भी उससे बड़े प्यार से बात की; दोपहर का स्वादिष्ट परंतु नीरस खाना खाया और बाड़े में अपने टपरी में खाट बिछा कर सो गया; थकान की वजह से कब नींद आ गई उसे पता भी नहीं चला।

शकुंतला के यहां काम करते हुए 8 साल बीत गए अब वह 16 साल का हो गया था। वह शकुंतला के परिवार में घुल मिल सा गया था और उसी परिवार को वह अपना परिवार मानने लगा था; लेकिन शकुंतला भी उसे अपना मानती थी यह कहना हास्यास्पद होगा क्योंकि कभी कोई  मालिक, नौकर को अपना मान ही नहीं सकता। यही इस कलयुग का नियम है।
यह पैसों की खाई है, ऐसे ना भरने वाली थी।

यह भी पढ़ें:- ठाकुर का कुआँ (प्रेमचंद)


भोला की हालत 8 साल बाद भी वैसी ही थी। मैली पेंट जिसके पीछे के छेद को ढकने के लिए दूसरे कपड़े को रखकर सिलाई की गई थी। मानो वह अपनी लाचारी बेबसी और गरीबी को छिपाने की कोशिश कर रहा हो। केवल कुछ खास मौकों को छोड़ दें तो उसने कभी कमीज़ नहीं पहनी थी।
अब उसके काका बाला ने उसकी शादी करने की बात  की बात शकुंतला से कही।

"भोला का विवाह करने की सोच रहा था। अब यह जिम्मेदारी भी पूरी कर लो तो बुढ़ापा सुख चैन से गुजर जाएगा।" बाला के चेहरे पर थकान साफ प्रतीत हो रही थी।
"छोरी देख ली क्या?"
"रामगढ़ के हीरा की लड़की से 10 साल पहले ही सगाई कर दी थी।" बाला ने बड़े गर्व से कहा।
"सोना  से?" शकुंतला के चेहरे के भाव से ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे वह सोना को पहले से जानती हो।
"हां हुजूर कोई दोष है क्या उसमें?" बाला ने शंका भरी निगाहों से देखते हुए कहा।
"नहीं नहीं भोली है बच्ची" शकुंतला ने निश्चिंत होते हुए कहा।
 बाला ने भी राहत की सांस ली। बाला शकुंतला के पास आया तो पैसे मांगने था पर हिम्मत नहीं हुई वह डरा-डरा सा लग रहा था लेकिन शकुंतला को चेहरा पढ़ने में महारथ हांसिल थी।
" कोई तकलीफ है क्या बाला?" शकुंतला की निगाहें बाला के चेहरे को चीरती हुई अंदर जा रही थी मानो वह कुछ पढ़ने की कोशिश कर रही हो।
" कुछ पैसे चाहिए थे, भोला की शादी के लिए।" सकपकाया हुआ बाला हिम्मत जुटाकर बोला।
" तुम्हें तो मेरा उसूल पता है न; पैसे उधार देने का?" शकुंतला ने कड़क और स्पष्ट आवाज में कहा।
 बाला को पता था कि शकुंतला हिसाब के मामले में बहुत ही स्पष्ट व सख्त थी।
" हां हुजूर; इस बार पक्का सूद समेत समय पर वापस कर दूंगा।" बाला ने बड़ी आत्मविश्वास भरी आवाज में कहा, जिसका लाभ उसे मिलने वाला था।
"ठीक है कितना चाहिए" शकुंतला ने चेहरे के तनाव को कम करते हुए कहा।
"बस 30,000 इतना तो खर्च हो ही जाता है आजकल विवाह में।"  बाला ने बिना समय गवाएं अपनी बात रखी।
" लेकिन मैं भोला की पगार में से महीने के महीने सूद काटती रहूंगी।" शकुंतला ने अब सौदे में नई शर्त लगाते हुए कहा।
"मंजूर है हुकुम।" बाला की नाखुशी उसके चेहरे के भाव से आसानी से पढ़ी जा सकती थी लेकिन वह परिस्थिति के आगे मजबूर था।

यह भी पढ़ें:- मोबाइल और इंसान (आयुष पांडेय)

शकुंतला से पैसे उधार लेने का मतलब था जिंदगी भर की गुलामी। यह लोगों को ब्याज के भंवर में ऐसा फसाया करती थी कि वापस निकलना बहुत ही मुश्किल हो जाया करता था। बाला व भोला इस बात को अच्छी तरह समझते हुवे भी इस भंवर में फसने को तैयार बैठे थे। शायद उनकी मजबूरी को समझने वाला वहां कोई नहीं था।


"बेचारा" बाला अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा था। पहले भोला की पगार सीधे बाला के पास आती थी। उसका भी तंबाकू,शराब और जुए का खर्चा निकल जाता था। अब उस पर भी शकुंतला की कैंची चल पड़ी।

 आखिरकार एक दिन भोला भी विवाह बंधन में बंध गया। सोना अपने नए घर में आ गई। शकुंतला ने उसे भी बड़े प्यार से रखा। लेकिन यह प्यार ज्यादा दिन तक टिक नहीं पाया। राजस्थान में एक कहावत है "नई बीनणी का, 9 दन लाड़"

भोला के विवाह को एक महीना बीत चुका था। अब सोना भी भोला की तरह दिन भर काम में लगी रहती। सोना ने कभी अपने पिता के घर में काम नहीं किया था लेकिन वह परिस्थितियों से वाकिफ थी। उसको काम करते देख कर लगता कि मानो उसने इस बेगार को अपनी किस्मत का बोझ समझ कर उसे स्वीकार कर लिया हो। जब उसे रामगढ़ के चौक की याद आती तो उसकी आंखों में रोमांच देखने को मिलता। वहां वह अपनी सहेलियों संग खूब खेली थी, लेकिन अब उन्हें जहन में लाने का कोई फायदा उसे नजर नहीं आता था। उसे पता था कि उसे जमकर काम करना है क्योंकि शाम को उसी अनुपात में खाना परोसा जाएगा।

 जिंदगी को खुलकर जीने वाली सोना की जिंदगी अब केवल उस बाड़े में सिमट कर रह गई थी। यही उसकी और भोला की मजबूरी थी।


निवेदन:- अगर आपको यह कहानी "मजबूर भोला" अच्छी लगी हो तो इसे शेयर करें और अपने अनुभव हमें Comment करके जरूर बताएं। आपका सुझाव अमूल्य है।



यदि आपके पास Hindi में कोई article, inspirational story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे  E-mail करें. हमारी Id है: hindiwritings@gmail.com.पसंद आने पर हम उसे आपके नाम के साथ यहाँ PUBLISH करेंगे. Thanks!

No comments

लड़कियां महफूज क्यूँ नहीं - शम्भूनाथ | HindiWritings.com

लड़कियां महफूज क्यूँ नहीं - शम्भूनाथ | HindiWritings.com घर घर में जहाँ पूजा हो ||  पूजी जाती हो मुर्तिया ||   उस देश में मु...

Powered by Blogger.