नज्म- जी लेने दो

थोड़ा वक़्त ले लेने दो,
थोड़ी ज़िन्दगी जी लेने दो,
तुम्हारी, उसकी, सबकी
बोहत सुनली मैंने,
मुझे थोड़े अब अपने मन की कर लेने दो,
परहेज़ नज़रों के बोहत कर लिए तेरे हिसाब से,
अब मुझे जरा उसे जी भर के देख लेने दो,
रस्मों रिवाजों की रावायेगी बोहत करली,
अब मंदिर में नमाज़ पढ़ लेने दो,

हिजाबों में तो सालों से कैद हैं नज़रे मगर,
आज पर्दों को फेंक, आँख मिचौली खेल लेने दो,
बगीचे में कैद कबसे है तन्हा भवरा एक,
माली से कहके तितलियों से आज उसे मिलने दो,
सूखी सूखी तो कबसे जी रहे हैं ज़िन्दगी,
अब मयखाने में कुछ शामें गुज़ारने दो,
थोड़ा वक़्त ले लेने दो,
थोड़ी ज़िन्दगी जी लेने दो ।।

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