नज़्म- आहट

एक आहट सुनी थी मैंने, उसमें लबरेज़ थी खनक तेरी पाज़ेब की,
मानो राह के एक मोड़ पे खड़ा हूँ मैं, और दूसरे मोड़ से तुम आ रही हो,
राह सुनसान है पूरी, बिखरती चाँद की रौशनी भी है,
हैं उसमें गुलाब के पेड़ कई, और राह पूरी महकती सी है,
तुम आओगी जब गुज़र के राह से उस मोड़ से इस मोड़ तक,
लगोगी गले मुझसे या फिर शिकायतें कई करोगी,
रो दोगी देख के मुझे या हाल मेरा पूछोगी,
‘इंतज़ार नहीं कर सकते थे’, शायद ये शिकायत तो जरूर करोगी,
मिसाल दोगी अपनी नयी मोहोब्बत की,
या मेरे साथ गुज़रा था जो वक़्त उसे याद करोगी,
राह सुनसान कुछ देर खामोश ही रहेगी,
ना तुम बोलोगी कुछ, ना मैं कुछ कह पाउँगा,
देखेंगे एक दूसरे को बस, और रात ये गुज़ार जाएगी ।

अगली रात मैं फिर यही सपना देखूंगा,
फिर आहट सुनूँगा तेरे क़दमों की,
मैं फिर उसी मोड़ तेरा इंतज़ार करूँगा ।।
                                 ✍ Priyansh Varma


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