नज़्म – बदलाव

जो बीता कुछ वक़्त पुराना, वो वक़्त ही कुछ और था,
उस दौर में आदमी तन्हा नहीं था, उस वक़्त में सुकून था,
कई किस्से कहानियां जमा किया करते थे हर रोज़, गली कूचों में बैठके,
आजकल कुछ हो ऐसा तो बस मोबाइल में स्क्रीनशॉट ले लिया करते हैं,
तस्वीर कोई अपनी देख के उस वक़्त ताज्जुब हुआ करता था,
कब और किसने ली होगी ये तस्वीर बस इसी सोच में काफी वक़्त निकलता था,
आजकल तो तस्वीरें इतनी सस्ती हो चली है के अब तस्वीर लेने का मन नहीं करता,

घर इतने ऊँचे हो चले है के,
छत पर गए तो अरसा हो गया, सूरज ढलते कब देखा था ये भी अब सोच विचार का मसला हो गया,
गुज़र जाता है दिन पूरा उसी एक कमरे में, गुज़र जाना है मुझे भी एक दिन उसी एक कमरे में,
बाहर बैठे गप्पे लड़ाए अरसा हो गया, पता चलता है के अब मैं बड़ा हो गया,
बदलाव अच्छा है जीवन के लिए, पर इतना तेज़ चलना भी कहाँ गवारा हैं,
उस बुजुर्ग की सोचो, उस पड़ोस की सोचो जो आज भी तुम्हारे कुछ वक़्त का मारा है,
संदेशें आजकल झट से पहुँच जाया करते है, हो सुख का या दुःख का एक पल में पास उनके पहुँच जाते हैं,
एक हम ही है जो दिन भर की भागदौड़ में उनसे ना मिल पाते हैं,

खत लिखना तो आजकल भूल ही चले है हम,
नज़दीक का पोस्ट ऑफिस कहाँ हैं क्या ये भी याद है तुम्हे,
खत लिखना तो दूर, स्टैम्प की जानकारियां भी नहीं है हमें,
बदलाव अच्छा है, बढ़ना भी जरुरी है,
पर पेड़ बढ़ने पर भी अपनी जड़ें नहीं छोड़ा करते,
जो छोड़ देते है जड़ें अपनी, पल भर में गिर जाया करते हैं,
आदमी हम बोहत जल्दी अपने इतिहास को भूल जाया करते हैं,
कुछ वक़्त दो उस वक़्त को भी, चीज़ें वो करो जो बचपन में किया करते थे,
जियो खुलके ऐसे जैसे बचपन में बेफिक्री से जिया करते थे,
ज़माना बदला नहीं है, दोष क्यों इस ज़माने को देते हो,
बदल तो तुम गए हो, आजकल एक भ्रम में जो रहते हो ।।

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