वृद्ध की पीड़ा

हूँ परेशान हैरान इस बात से कि…
जिन बच्चों को कहानियां सुनाकर
मैं सुलाता था
उन्हीं बच्चों को आज मैं
तनिक भी न भाँता हूँ
क्या मैं अब इतना बुरा हो गया हूँ?

बचपन में जिस लाल को
ऊँगली पकर चलना सिखलाया मैंने
वहीं लाल आज ..
बड़ा होकर कहता है
आपने मेरे लिए किया हीं क्या है
क्या मैंने सच में कुछ नहीं किया
उनके लिए?

सिखलाया मैंने जिन बच्चों को
सलीके से जीना
दुःखी न रहना
कर दिया स्वयं को समर्पण
उनकी खुशी के लिए
वो ही बच्चे आज दे रहें हैं
मुझे असहनीय पीड़ा
क्या मैं इसी काबिल हूँ?

चेहरे की झूर्रियाँ
मौत का खौफ
कंपकंपाते हाथ
दर्द इन सभी से तो
अब जूझ रहा हूँ
इन तकलीफों का एहसास नहीं है
मेरे लाल को
क्या एकदिन मेरे भी बच्चे बूढ़े नहीं होगें?

मेरे बच्चों सुन लो
जो दर्दे सितम
और सिहरन दे रहे हो तुम मुझे आज
यही इतिहास तुमसे भी दोहरायेंगे
तुम्हारे बच्चे
उस दिन होगा एहसास तुम्हें कि
क्या मेरे पिता सच्च में ईश्वर थे?

कुमार संदीप

कुमार संदीप

कलम का छोटा सिपाही

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