मै जनता का सेवक हूँ || Main Janta Ka Saivak Hun || Hindi Writings

Poem on indian politician

स्वार्थी नेता




तू सोया था किस मस्ती में ॥

जब आग ली बस्ती में॥

जब काम पड़े तो आते हो॥

हाथ जोड़ चिल्लाते हो॥

मै जनता का सेवक हूँ॥

मेरी विनय स्वीकार करो॥

फिर से खडा हूँ। इलेक्शन में ॥

मेरा भी बेडापार करो॥

जब ठण्ड का कड़क महीना था॥

लोगो का सड़क पे जीना था॥

कितने लोगो की जान गयी॥

कुछ हाय हाय चिल्लाए थे॥

हाथ में लेके कुछ कागज़ ॥

कितने चक्कर लगवाए थे॥

उस दिन तुम न आये ॥

सब आश लगाये बैठे थे॥

अब हाथ जोड़ के बोल रहे हो॥

जब सब तुमसे जब ऐठे है॥

सब समझ गए है चाल तुम्हारी॥

तुम राजनीती के तालिब हो॥

सारे डंडे बरसाए गे ॥

तुम इसके ही काबिल हो॥

क्यों खो गया अपनी मस्ती में॥

जब आग लगी थी बस्ती में..


शम्भू नाथ कैलाशी






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