भटक गया था राहो में

मिला नहीं ओ मित्र हमारा ॥
जो भटक गया था राहो में ॥
जान निछावर मुझपर करता ॥
भरता रहता था बाहो में ॥
मेरी चिंता उसे सताती ॥
ध्यान हमारा देता था ॥
कोई संकट मुझपर आता तो ॥
ओ अपने सर पर लेता था ॥
धूप मुझे जब लगने लगती ॥
कर देता था छाहों में ॥

जान निछावर मुझपर करता ॥
भरता रहता था बाहो में ॥
नजर लगाया किसी ने मुझपर ॥
ओ बंधन से छूट गया ॥
प्रेम रिश्ता कुछ ही पल में ॥
सस्ते में ही टूट गया ॥
कभी कभी अब भी मिलता है ॥
केवल मुझको ख्वाबो में ॥
जान निछावर मुझपर करता ॥
भरता रहता था बाहो में ॥

2 thoughts on “भटक गया था राहो में

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *